{"product_id":"devi-rakshati-rakshitah-hindi-novel","title":"देवी रक्षति रक्षित: | Devi Rakshati Rakshitah | Hindi Novel","description":"\u003cp\u003e\u003cem\u003e\"ऐं ऱ्हीं क्लीं चामुंडायै विच्चै...\"\u003c\/em\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eज़ोर-ज़ोर से मंत्रोच्चार शुरू हो गया।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसामने काली माता की एक बड़ी मूर्ति खड़ी थी — उसे देखकर ही बड़े-बड़ों का दिल दहल जाए। मूर्ति के गले में अलग-अलग तरह की मालाएँ दिखाई दे रही थीं। फूलों की मालाएँ वह पहचान पाई, लेकिन बाकी मालाएँ इतनी दूर से पहचान में नहीं आ रही थीं। और उन्हें पहचानने की उसकी इच्छा भी नहीं थी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअचानक उसे ठंड लगने लगी। ओढ़नी तलाशते हुए उसे एहसास हुआ — उसके शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं है। सिर्फ फूलों की मालाएँ। डर और शर्म से शरीर में सिहरन दौड़ गई, आँखों में आँसू आ गए।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eवह वहाँ से निकल जाना चाहती थी — लेकिन पैरों में मन-मन भर की बेड़ियाँ थीं। पूरा शरीर किसी बंधन से जकड़ा हुआ था।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसामने हवनकुंड धधक रहा था। एक भैंसा बँधा हुआ था। बलिवेदी दिखाई दे रही थी। खड्ग उठाया गया...\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eऔर वह खुद को रोक न सकी —\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"रुको...\"\u003c\/p\u003e","brand":"MyMirror Publishing House","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":54099270205808,"sku":null,"price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/1010\/1679\/7552\/files\/Devi1.jpg?v=1785743212","url":"https:\/\/mymirrorpublishing.in\/products\/devi-rakshati-rakshitah-hindi-novel","provider":"MyMirror Publishing","version":"1.0","type":"link"}