देवी रक्षति रक्षित: | Devi Rakshati Rakshitah | Hindi Novel
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"ऐं ऱ्हीं क्लीं चामुंडायै विच्चै..."
ज़ोर-ज़ोर से मंत्रोच्चार शुरू हो गया।
सामने काली माता की एक बड़ी मूर्ति खड़ी थी — उसे देखकर ही बड़े-बड़ों का दिल दहल जाए। मूर्ति के गले में अलग-अलग तरह की मालाएँ दिखाई दे रही थीं। फूलों की मालाएँ वह पहचान पाई, लेकिन बाकी मालाएँ इतनी दूर से पहचान में नहीं आ रही थीं। और उन्हें पहचानने की उसकी इच्छा भी नहीं थी।
अचानक उसे ठंड लगने लगी। ओढ़नी तलाशते हुए उसे एहसास हुआ — उसके शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं है। सिर्फ फूलों की मालाएँ। डर और शर्म से शरीर में सिहरन दौड़ गई, आँखों में आँसू आ गए।
वह वहाँ से निकल जाना चाहती थी — लेकिन पैरों में मन-मन भर की बेड़ियाँ थीं। पूरा शरीर किसी बंधन से जकड़ा हुआ था।
सामने हवनकुंड धधक रहा था। एक भैंसा बँधा हुआ था। बलिवेदी दिखाई दे रही थी। खड्ग उठाया गया...
और वह खुद को रोक न सकी —
"रुको..."
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